Wednesday, September 6, 2017

सत्तर साल में सातसौ लफड़े – 700 struggles and 70 years

सत्तर साल हो गये देश को
आज भी भूखे लगा रहे हैं हूक
ना कुछ बना है ना कुछ बिगड़ा
टुकड़ो में हर व्यक्ति बिखरा

जो बचा पाये थे हम इतिहास से
अफसर - नेता पचा गये चुनाव से
गरीब आज भी भूखे पेट है सोता
आज़ादी के भ्रम में मेरे साथ है रोता

सत्तर साल में सातसौ लफड़े
गांव गल्ली में आब हम हैं सड़ते

बुरे बाबू से हैं लड़ते
और गोरों को अभ भी हैं गाली देते

नये नये आडम्बरों में उलझे
नये नये भाषड़ो में उड़ते
भ्र्ष्टाचार में लिप्त हैं सिपाही
बो लापरवाह जिनकी सरकार आयी

सत्तर साल से हम गा रहे हैं गान
बाँट रखा है जातियों में समाज
वही खड़ी है मजहबों की दीवार
आज भी लग रही है आज़ादी की पुकार

न्याय की कौन सुने है यार
सबका अपना अपना है कानून
हर कोई माँग रहा है आरक्षण
अपराधि को मिल रहा है सरंक्षण

सत्तर सालों में सैंकड़ो पीड़ित
हर डील में करोड़ों की डीलिंग
हर चौराहे पर नंगा नाच
भूल गए स्वतंत्रता संग्राम

कलैक्टर का आज भी रौला है
लाल हरे केसरिया सलाम का बोल बाला है
यहीं पूरा देश अटका है
डिवाइड एंड रूल से लटका है

सत्तर साल से पढ़ रहे हैं संविधान
और कैसे होगा उसका अपमान
आम जनता पे पड़ती है लात
आज भी बस है विधि का विधान

हर कोई कर रहा है लूट
चोरों को है पूरी छूट
नेताओं की मिटे ना भूख
बाबू बने हैं मिस्टर विद ब्लैक बूट...



Translation In English:

700 struggles and 70 years

New country and 70 year old,
Poor are still starving,
Nothing has improved nor worsened,
But all of us are scattered.

What we had saved from history,
It got looted by Officers and Leaders,
The poor still sleep empty stomach,
Cries with me in the confusion of independence…

Seven hundred struggles in Seventy years,
We are rot in our allays and villages,
We fight with own brethrens in government offices,
And still blame whites for the bureaucratic system.

Entangled in new pomp and show,
Buying the new promises of pseudo-leaders,
The guardians are themselves deep in corruption,
And those come in power are negligent.

For seventy years we are singing same song,
Still we are divided in same caste,
Standing behind the same old wall of religion,
These are still crying for freedom.

Who needs the law of land and justice?
Everyone has their own law,
Everyone is asking for reservation,
In the end only criminals are getting protected.

Innumerable injuries in seventy years,
Siphoning of crores in every deal,
Bludgeoning at every crossroad,
Have we forgotten our freedom struggle?

The bureaucrats rule the roast,
Communist and Religions Flags have their say,
This whole country is stuck here,
Hanging on Divide and Rule.

We are studying constitution for seventy years
And how else we can insulted it,
The common public gets kicked,
Now too we left with only heavenly justice.

Everyone is looting,
Thieves have full exemption,
Leaders are always hungry,
Bureaucrats are snobbish and corrupt.

Saturday, August 12, 2017

ये नया युग - This new era


ये नया युग - रवींद्र विक्रम सिंह
सुबह  सुबह धुप  के  संग  खिलते  वो  रंग,
पहली  बारिश  में  भीगी  मिट्टी की  वो सुगन्ध,
हर  समय  वो चिड़ियों का  साथ  देना,
कभी  कभी तितलियों  का हमसे  इतराना,
अब  नही हमारे शहरों कस्बों में ...

अब बस  हम  अकेले  रहते  हैं, 
जूझते  रहते  हैं नई मशीनो से  चौके में,
ना  सर्दी  की  सर्द  पसंद है ना  चैत की गर्मी ,
 ना सावन  के झूले  हैँ ना भादों की बारिश, 
बस मदहोश  पड़े  रहते हैं टीवी  और ऐसी मे...

अब कहाँ  खेलते  हैं हमारे बच्चे  गलियों  में,
अब वो फेसबुक  कंप्यूटर  फ़ोन  पर  लगे  रहते हैं,
अब कहाँ गंदे होते  हैं उनके कपड़े,
कहाँ वो होली  ईद  दीपावली,
नये युग  में हम  सब  कटे  कटे  से रहते हैं ....

अब बाप  कहाँ  डांट पाते  हैं   बच्चों को, 
अब लड़के  सोने  से पहले आई लव  यू  बोलते  हैं,
अब कहाँ शर्माती  हैं  लड़कियाँ  बिना    कपड़ों के,
अब  पैट्रोल डीज़ल का रेट कौन पूछता  है,
अब बस इंटरनेट कनैक्शन के झगड़े  हैं...

कौन सोचता  है अनाज  कहाँ से आय,
कौन देखता  है रातों में तार,
अब कौन ढूँढता है जुगूनुओँ की रोशनी,
अब बाल कटाने में भी  फैशन  के बहाने  हैं,
अब बस फ़िल्मी  हीरो  पर मरती  है जनता ...

ये  नया  युग है,
यहाँ जलाने  के  लिये लकड़ी  नहीं,
 साँस लेने  के लिए साफ हवा  नही,
डाइवोर्स  होते रहते हैं रिश्ते,
यहाँ चादर  है पर सोने के लिए जगह नही...

Translation in English:
This new era - Ravindra Vikram Singh


New Colours with rays of dawn,
Smell of soil in first rain,
Around the clock, chirping of birds
Times when butterfly flirts with us,
Such moments are no longer in our towns…
 

We live alone
Battling with new machines in kitchen,
We neither like cold winter or hot summers,
No the swings in spring, No rains of the season,
We are stuck with TV and AC...



Now, children don’t play in streets,
They are busy with facebook, computer, phone,
Their cloths don’t get soiled,
Neither Holi, Eid, Diwali are same,
New age we live apart and secluded...


When does father scold their children now,
Before sleeping children say “I love you now”,
None gets shy without cloths these days,
Nobody asks for price of petrol or diesel,
Today, we are more worried about data connection...


Who thinks from where the grains come?
Who stars at the stars at night?
Who looks for light of fireflies?
Now hairstyling is more fashionable.
And people are fans only of film stars.

This is a new era
No firewood to burn,
No clear air to breathe,
Relationships are getting divorced,
And there are sheets but no place to sleep…

 
 

RVS

Ravindra Vikram Singh रवींद्र विक्रम सिंह ரவீந்திர விக்ரம் சிங் રવીન્દ્ર વિક્રમ સિંહ రవీంద్ర విక్రమ్ సింగ్ রবীন্দ্র বিক্রম সিং ರವೀಂದ್ರ ವಿಕ್ರಮ್ ಸಿಂಗ್