Wednesday, February 27, 2013

चलता रहा, हसता रहा !!!


दर दर तेरी आस में,
तेरे प्यार की सुअगत में!
चलता रहा,
हसता  रहा!

चोर चोरी कर गए,
में मासूम बनता रहा,
देश धरती भूल के,
इंसानियत चुन्गता रहा!

सरकारी किताब थी,
इन्फ्लेशन की मार ही!
आपराध सुजता समाज था,
स्त्री पुरुष पे कलंगो का भार था!

बहरूपियों का जंजाल था,
चिक्ति पुकार थी!
मांगती सर्कार थी,
सब बन गया बाज़ार था!

आत्मा की आवाज़ थी,
माँ की पुकार थी!
में चलने लगा,
हसने लगा!

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Ravindra Vikram Singh रवींद्र विक्रम सिंह ரவீந்திர விக்ரம் சிங் રવીન્દ્ર વિક્રમ સિંહ రవీంద్ర విక్రమ్ సింగ్ রবীন্দ্র বিক্রম সিং ರವೀಂದ್ರ ವಿಕ್ರಮ್ ಸಿಂಗ್